18.09.2020
सुबह लगभग 6AM उठा तो देखा जयदेव जी मुझसे पहले ही जाग चुके थे। चाय वाले को call की तो कुछ समय पश्चात चाय आयी। हमने चाय पीते- पीते यू ट्यूब चैनल 'sahityadesh' के लिए जयदेव जी के इंटरव्यू के लिए कुछ प्रश्न भी तैयार कर लिये।
आप इंटरव्यू इस लिंक पर देख सकते है- जयदेव चावरिया
विनोद प्रभाकर जी ने नाश्ता की बहुत अच्छी व्यवस्था की थी। चाय वाला लड़का कुछ समय पश्चात नाश्ता के भी व्यवस्था भी कर गया।हमने जब टिफिन खोला तो पराठों कि खुश्बू ने भूख को तेज कर दिया। चार पराठें, बड़े आकार।
''सर, इतने बड़े पराठे?''
"हाँ,कुछ ज्यादा ही बड़े हैं। खाना मुश्किल हो जायेगा।"
दो-दो पराठों आचार के साथ खाये तो सच में पेट भर गया और उस दिन हमने उस भारी नाश्ते के अतिरिक्त कुछ नहीं खाया। दोपहर के भोजन का आवश्यक महसूस नहीं हुयी।
"जयदेव भाई, पराठों के हिसाब से साथ में चाय कम है।"
"हाँ।"- जयदेव ने पराठों का कौर खाते के पश्चात चाय का घूँट भरते हुये कहा।
चाय-नाश्ते के कुछ समय पश्चात विनोद प्रभाकर जी ने फ्लैट में कदम रखे। समय लगभग दस बजे का था।
"चाय-नाश्ता हो गया?" -विनोद जी ने आते ही पूछा।
''जी सर।''- जयदेव जी का संक्षिप्त उत्तर था।
जयदेव जी की यह कम बोलते हैं।
"सर नाश्ता तो बहुत heavy था। मुझे लगता है आज शाम तक खाने की आवश्यक नहीं होगी।"
"हाँ सर, पराठॆं स्वादिष्ट भी थे और बड़े भी। थाली में एक ही पराठा आया था।"
"अब आगे क्या विचार है?" - आगे चर्चा के दौरान विनोद जी ने पू़छा।
"यहाँ से आबिद रिजवी जी के पास चलना है।"
"वापसी तो यहीं आओगे?"
"अरे! नहीं सर। 3:30PM को जयदेव जी की ट्रेन है।"- मैंने कहा।
"अच्छा, तो आप तो रुकोगे?"- विनोद जी ने पूछा।
" नहीं सर, मेरी भी ट्रेन है शाम को। टिकट कन्फर्म है।"
"आप तो गुरप्रीत जी कुछ दिन रुकते। अभी तो बहुत बातें बाकी हैं। आपको मेरठ घूमाते।"
"नहीं सर, फिर कभी। अभी तो स्कूल की छुट्टियां खत्म हो रही हैं तो स्कूल भी जाना है।''
मैंने 04.09.2022 से पन्द्रह दिवस की पितृत्व अवकाश की छुट्टियां ले रखी थी। उन्हीं छुट्टियों में मेरठ का कार्यक्रम बना था।
विनोद जी की हार्दिक इच्छा थी, मैं कुछ दिन और मेरठ ठहर जाऊं, पर मेरे लिए यह संभव न था। विनोद जी जितने मृदभाषी हैं उतने ही मेहमानबाजी करने में कुशल। विनोद जी के फ्लैट पर जब लेखक मित्र एकत्र हुये तो विनोद जी और इनके सुपुत्र सब लेखक मित्रों की सेवा में तत्पर रहे। चाय, नाश्ता, कोल्डड्रिंक, खाना आदि दौर समय-समय पर चलते रहे। साथी मित्र ना-ना करते रहे पर विनोद जी ने इस विषय पर किसी की बात नहीं सुनी।
अच्छी सेवा के लिए विनोद जी को धन्यवाद।
विनोद जी की कार से हम मेरठ आबिद रिजवी से मिलने चल दिये। रास्ते में विनोद जी के उपन्यासों की चर्चा चल पड़ी। विनोद जी के उपन्यासों पर फिल्मों की घोषणा भी हुयी, पोस्टर भी जारी हुये पर कुछ कारणों से वह योजना आगे न बढ सकी।
सुबह लगभग 6AM उठा तो देखा जयदेव जी मुझसे पहले ही जाग चुके थे। चाय वाले को call की तो कुछ समय पश्चात चाय आयी। हमने चाय पीते- पीते यू ट्यूब चैनल 'sahityadesh' के लिए जयदेव जी के इंटरव्यू के लिए कुछ प्रश्न भी तैयार कर लिये।
आप इंटरव्यू इस लिंक पर देख सकते है- जयदेव चावरिया
विनोद प्रभाकर जी ने नाश्ता की बहुत अच्छी व्यवस्था की थी। चाय वाला लड़का कुछ समय पश्चात नाश्ता के भी व्यवस्था भी कर गया।हमने जब टिफिन खोला तो पराठों कि खुश्बू ने भूख को तेज कर दिया। चार पराठें, बड़े आकार।
''सर, इतने बड़े पराठे?''
"हाँ,कुछ ज्यादा ही बड़े हैं। खाना मुश्किल हो जायेगा।"
दो-दो पराठों आचार के साथ खाये तो सच में पेट भर गया और उस दिन हमने उस भारी नाश्ते के अतिरिक्त कुछ नहीं खाया। दोपहर के भोजन का आवश्यक महसूस नहीं हुयी।
"जयदेव भाई, पराठों के हिसाब से साथ में चाय कम है।"
"हाँ।"- जयदेव ने पराठों का कौर खाते के पश्चात चाय का घूँट भरते हुये कहा।
चाय-नाश्ते के कुछ समय पश्चात विनोद प्रभाकर जी ने फ्लैट में कदम रखे। समय लगभग दस बजे का था।
"चाय-नाश्ता हो गया?" -विनोद जी ने आते ही पूछा।
''जी सर।''- जयदेव जी का संक्षिप्त उत्तर था।
जयदेव जी की यह कम बोलते हैं।
"सर नाश्ता तो बहुत heavy था। मुझे लगता है आज शाम तक खाने की आवश्यक नहीं होगी।"
"हाँ सर, पराठॆं स्वादिष्ट भी थे और बड़े भी। थाली में एक ही पराठा आया था।"
"अब आगे क्या विचार है?" - आगे चर्चा के दौरान विनोद जी ने पू़छा।
"यहाँ से आबिद रिजवी जी के पास चलना है।"
"वापसी तो यहीं आओगे?"
"अरे! नहीं सर। 3:30PM को जयदेव जी की ट्रेन है।"- मैंने कहा।
"अच्छा, तो आप तो रुकोगे?"- विनोद जी ने पूछा।
" नहीं सर, मेरी भी ट्रेन है शाम को। टिकट कन्फर्म है।"
"आप तो गुरप्रीत जी कुछ दिन रुकते। अभी तो बहुत बातें बाकी हैं। आपको मेरठ घूमाते।"
"नहीं सर, फिर कभी। अभी तो स्कूल की छुट्टियां खत्म हो रही हैं तो स्कूल भी जाना है।''
मैंने 04.09.2022 से पन्द्रह दिवस की पितृत्व अवकाश की छुट्टियां ले रखी थी। उन्हीं छुट्टियों में मेरठ का कार्यक्रम बना था।
विनोद जी की हार्दिक इच्छा थी, मैं कुछ दिन और मेरठ ठहर जाऊं, पर मेरे लिए यह संभव न था। विनोद जी जितने मृदभाषी हैं उतने ही मेहमानबाजी करने में कुशल। विनोद जी के फ्लैट पर जब लेखक मित्र एकत्र हुये तो विनोद जी और इनके सुपुत्र सब लेखक मित्रों की सेवा में तत्पर रहे। चाय, नाश्ता, कोल्डड्रिंक, खाना आदि दौर समय-समय पर चलते रहे। साथी मित्र ना-ना करते रहे पर विनोद जी ने इस विषय पर किसी की बात नहीं सुनी।
अच्छी सेवा के लिए विनोद जी को धन्यवाद।
विनोद जी की कार से हम मेरठ आबिद रिजवी से मिलने चल दिये। रास्ते में विनोद जी के उपन्यासों की चर्चा चल पड़ी। विनोद जी के उपन्यासों पर फिल्मों की घोषणा भी हुयी, पोस्टर भी जारी हुये पर कुछ कारणों से वह योजना आगे न बढ सकी।
"विनोद जी आप विनोद प्रभाकर के नाम से जासूसी उपन्यास लिखते थे फिर सुरेश साहिल के नाम से सामाजिक उपन्यास लिखने का विचार कैसे आया?"
विनोद प्रभाकर जी गाड़ी ड्राइव करते हुए, नजरें सामने सड़क पर लगाये हुये थे पर उनका मस्तिष्क प्रकाशक के कार्यालय में घूम रहा था।
"हाँ, यह भी यादगार बात है। मेरे जासूसी उपन्यास अच्छे चल रहे थे पर मन में कहीं न कहीं सामाजिक कहानियाँ भी घूम रही थी। तब सामाजिक उपन्यास किसी अन्य नाम से लिखने का मन किया तो 'सुरेश' भाई के नाम से लिखने आरम्भ किये। प्रकाशन ने कहा की सुरेश नाम छोटा है कुछ और साथ जोड़ों तो सुरेश के साथ साहिल नाम हमें सही लगा।"
"तो इस प्रकार विनोद प्रभाकर जी सुरेश साहिल हो गये।"- जयदेव जी ने कहा।
"आज मेरे बच्चे अपना सरनेम 'प्रभाकर' ही लगाते हैं और भाई के बच्चे अपना सरनेम 'साहिल' लगाने लग गये।"
मेरे दिमाग में तुरंत अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन का ख्याल आया। हरिवंश राय बच्चन का बचपन में 'बच्चवा' कहते थे और उन्होंने 'बच्चवा' को परिष्कृत कर 'बच्चन' बना लिया और यही 'बच्चन' आज उनकी गोत्र हो गयी। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण है जहाँ गोत्र बदल जाते हैं।
"आपने अपने बालों का स्टाइल नहीं बदला। उपन्यास के बैक कवर में जो आपकी तस्वीर थी वहाँ जो बालों का स्टाइल था वही आज भी है।"- मैंने विनोद जी के बालों की तरफ देखते हुये कहा।
विनोद प्रभाकर जी ने हँसते हुये कहा-"बिलकुल सही कहा। यह मेरा प्रिय स्टाइल है जो आज भी वैसे का वैसा ही है।"
विनोद प्रभाकर जी ने जहाँ जासूसी उपन्यासों में अच्छी पहचान बनाई है तो वहीं सामाजिक उपन्यासों में पाठकवर्ग 'लौट आओ सिमरन' उपन्यास के तौर पर आज भी सुरेश साहिल जी को जानता है। फिल्म लेखन में रणवीर पुष्प जी के साथ कार्य किया लेकिन किसी कारणवश यह योजना सफल न हो पायी। वहीं उपन्यासकार वेदप्रकाश वर्मा जी के साथ सफल प्रकाशन संस्थान भी चलाई और वर्तमान में दो निजी शिक्षण संस्थानों का संचालन कर रहे हैं।
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जयदेव चावरिया, आबिद रिजवी जी और विनोद प्रभाकर जी |
आज आबिद रिजवी जी के घर पर तीन लेखक, तीन पीढ़ियाँ एकत्र हो रही थी। आबिद रिजवी साहब जिन्होंने इब्ने सफी साहब से आशीर्वाद लिया और लेखन आरम्भ किया, विनोद प्रभाकर जी जिन्होंने उपन्यास साहित्य का एक सुनहरा समय देखा, और नये लेखक जयदेव चावरिया जी, जिनका अभी मात्र एक ही उपन्यास प्रकाशित हुआ है।