साहित्य देश के काॅलम 'पात्र परिचय' में इस बार पढें लोकप्रिय उपन्यासकार वेदप्रकाश काम्बोज जी के प्रसिद्ध पात्रों में तीन विशेष पात्र कुंदन कबाड़ी, फन्ने खा तातारी और गोकुल मदारी का परिचय और वह भी उन्हीं पात्रों की जुबानी ।
प्रस्तुत अंश वेदप्रकाश काम्बोज जी के उपन्यास 'मौत की आवाज' से है। यहां कुंदन कबाड़ी, फन्ने खां तातारी और गोकुल मदारी जासूस विजय से मिलने जाते हैं और विजय को अपना परिचय देते हैं।
तो अब पढिये इन तीनों पात्रों का परिचय इन्हीं की जुबान से-
प्रस्तुत अंश वेदप्रकाश काम्बोज जी के उपन्यास 'मौत की आवाज' से है। यहां कुंदन कबाड़ी, फन्ने खां तातारी और गोकुल मदारी जासूस विजय से मिलने जाते हैं और विजय को अपना परिचय देते हैं।
तो अब पढिये इन तीनों पात्रों का परिचय इन्हीं की जुबान से-
विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'
'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।
'हम धन्य भये ।' विजय ने कहा, 'लेकिन बच्चो अब तुम उठो । और हमें बताओ कि तुम किस देश से किस काम के लिए हमारी कुटिया में जो कि इस भयानक शोरगुल वाले जंगल राजनगर में अवस्थित है, आए हो। यह भयानक जंगल जिसमें कदम कदम पर तिरछी आँखों और टेढ़ी चालों वाले आदमी निकलेंगे। शोर मचाते हुए लोहे के बड़े-बड़े राक्षस हर वक्त भयानक जंगल में हर वक्त दौड़ते हैं। है मेरे बच्चो तुम इन सबसे बचकर हम तक कैसे आ गए। यह मुझे बताओ ।'
'हे गुरुदेव !' तीनों में से एक बोला, 'भारत में एक शहर है। सुन्दर नगर। हम तीनों वहाँ के वासी हैं।'
'हे मेरे बच्चो ! अब तुम उठो।' विजय ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, 'और मुझे अपना -अपना परिचय दो ।'
तीनों नमूने उठे ।
हाथ जोड़कर एक बार फिर उन्होंने विजय के सम्मुख मस्तिष्क झुकाया और फिर सीधे खड़े हो गए ।
शक्ल से तीनों ही सुन्दर थे और मूर्खता के कोई चिन्ह उनके मुख पर नहीं थे। तीनों ही सौम्य और भद्र पुरुषों का सा व्यक्तित्व दिखाने के लिए प्रयत्नशील लगते थे। लेकिन वे फिर भी नमूने थे इसमें विजय को कोई शक न था ।
विजय से यह बच्चे आयु में उससे कुछ छोटे ही थे किन्तु फिर भी बच्चे ही थे, बोला- 'बच्चो, तुमने मुझे अपना परिचय नहीं दिया ।'
'गुरुदेव, आप तो अन्तर्यामी हैं। आपको परिचय देना दीपक को सूरज दिखाने के बराबर है।'
विजय ने गर्दन हिलाकर कहा, 'सो तो है सो तो है। हम हम तुम्हारा परि-जानते हैं कि हम अन्तर्यामी हैं लेकिन मेरे बच्चो, हय तुम्हारे कमल मुखों से सुनना चाहते हैं।'
'तो फिर सुनिए ।' उन तीनों में से एक ने कहा, 'गुरुदेव, आपके इस दास को कुन्दन कबाड़ी कहते हैं। बाप इतना कुछ करता है कि बेटे को कुछ करने की आवश्यकता नहीं रहती यानि मैं कुछ नहीं करता । आक्सफोर्ड से पढ़कर आया है और वहाँ पर भी झण्डे गाड़-कर आया हूं। गुरुदेव, आश्चर्य की बात है कि वहाँ पर मैं क्रिकेट का खिलाड़ी था और एक ओवर में छह बार छक्के लगाए थे यानि थर्टी सिक्स रन इन एक ओवर ।'
'सिक्सटी रन इन एक ओवर और इन एन आवर ?' विजय ने पूछा ।
'इन ए ओवर गुरुदेव ।' कुन्दन कबाड़ी बोला ।
विजय ने उसकी यह गप्प सुनकर गर्दन हिलाई और बोला-'अब मुझे यकीन आ गया कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह बिल्कुल ठीक है। अब तुम अपना परिचय दो ।'
और अगला नमूना किसी रिकार्ड की तरह बोल उठा, 'हे उस्तादे खाला खादिम को फन्ने खाँ तातारी कहते हैं। किसी जमाने के मशहूर पहलवान और सुन्दर नगर के मौजूदा ताजिर जनाब बन्ने खाँ तातारी को मेरे अब्बा होने का फख्र हासिल है। हमारा खानदान तारीखी हैसियत रखता है गुरुदेव । हमारे खानदान का पहला आदमी मुन्ने खाँ तातारी पहले मुसलमान हमलावर मुहम्मद बिन कासिम के साथ आया था और उसे हिन्दुस्तान की सरजमीन इतनी अजीज लगी कि मुहम्मद बिन कासिम वापस चला गया किन्तु वह यहीं रह गया। फिर हिन्दुस्तान की ओर से हमारे खानदान ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं । मुन्ने खाँ तातारी हमारे ही खानदान का आदमी था जिसने उस समय सोलंकी भीमदेव के साथ सोमनाथ की हिफाजत करने का था। लेकिन अफसोस वहां महमूद गजनवी और ब्राह्मणों की साजिश भयानक रही और हम कुछ न कर सके । 1857 के गदर में भी हमारे खानदान ने हिस्सा लिया है। मुन्ने खां तातारी इन दस बहादुरों में से एक थे जो गदर के लिए मेरठ से देहली आये थे । उस बहादुर सिपाही ने मुल्क की खिदमत के लिए आजादी के दीवानों के सेनापति वस्त खाँ के साथ कन्धे से कंधा मिलाकर फिरंगियों का मुकाबला किया। उस बहादुर सिपाही ने मुल्क के लिए अपनी जिन्दगी की शमा गुल कर दी। लेकिन आजादी की ऐसी शमा जला गया जो तब से लेकर उस समय तक बड़ी शान से जलती रही जब तक कि मुल्क आजाद न हो गया। जब तक कि लालकिले पर फिरंगियों के नापाक यूनियन जैक के स्थान पर अपना प्यारा तिरंगा न लहराने लगा। बोलो प्यारा तिरंगा जिन्दाबाद ! फन्ने खाँ तातारी जिन्दाबाद ।
रिकार्ड फिलहाल समाप्त हो गया और विजय ने उसे दुबारा चालू करने की चेष्टा नहीं की क्योंकि उसे यकीन हो गया था कि वे लोग वास्तव में ही उसके चेले हैं और यह जगविदित सत्य है कि चेलों से गुरु भी पनाह मांगता है। उसने फन्ने खां तातारी को चुप ही छोड़कर अगले एवं अंतिम नमूने की ओर देखा और बोला, 'तुम क्या चीज हो भाई ?'
उन नमूने ने पहले अपना गाल खुजाया और फिर हल्का सा झापड़ लगाकर कहना शुरू किया, 'गुरुदेव, मैं ना चीज है। नाम हो गोकुल मदारी है किन्तु घर वाले प्यार से उल्लू की सवारी कहते हैं, क्यों कहते हैं यह गुझे नहीं मालूम। बस कहते हैं। आप जो चाहें मरजी कह सकते हैं। गुरुदेव है न ! जहाँ तक काम का सवाल है मैं कुछ नहीं करता । पिता जी इतना कुछ कर देते हैं कि मुझे कुछ करने की जरूरत ही नहीं रहती। हालत कुछ माननीय कबाड़ी जी से मिलती जुलती है। पिताजी के और व्यापार के अलावा मुख्य व्यापार वह भी है कि भारतवर्ष सत्तर के लगभग सिनेमा हाऊस उनके हैं।'
'यानि पेशा भी मदारी का ही है?' विजय ने पूछा ।
'आपने बिल्कुल ठीक समझा है गुरुदेव !' गोकुल मदारी ने उसका समर्थन करते हुए कहा, 'जैसे माननीय कुन्दन कबाड़ी का पेशा खानदानी है। जब सिनेमा नहीं थे तो हमारी बहुत नाटक मंडलियाँ और सरकस कम्पनियाँ थीं। जब सिनेमा आये तो सत्तर के लगभग सिनेमा हाऊस हमारे हैं। जब कभी भी आपको फिल्म देखने की इच्छा हो, पास मुझसे ले सकते हैं।'
गोकुल मदारी के खामोश होने पर विजय ने पूछा, 'क्या आपका परिचव समाप्त हो गया ?'
'जी फिलहाल समाप्त ही समझिए ।' गोकुल मदारी बोला-'क्योंकि गोकुल मदारी का परिचय तो यहीं समाप्त हो जाता है। इससे आगे तो केवल उल्लू की सवारी का परिचय रह जाता है जिसे आप...।'
'सुनाना पसन्द तो करूंगा लेकिन इस समय नहीं।' विजय ने कहा- 'मेरा ख्याल है कि मुझे तो अपना परिचय देने की जरूरत विल्कुल भी नहीं है।'
'बिल्कुल नहीं गुरुदेय !' तीनों ने समवेत स्वर में कहा, 'हम आपके बारे में बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।'
'यह सुनकर हम प्रसन्न भये।' विजय बोला, 'आइए अब गुरुदेव विजय अपने अनजाने शिष्यों का यानि तुम लोगों का स्वागत करते हैं। आइए स्वागतम !'
और तीनों नमूनों ने फिर समवेत स्वर में कहा 'हे गुरुदेव ! धन्य भाग तुम्हारे नहीं हमारे जो हम यहां पधारे ।'
विजय ने अनुभव किया कि तीनों युवक उसके पदचिन्हों पर चल रहे हैं। साथ ही उसने यह भी महसूस किया कि तीनों में कोई भी कुछ विशेष प्रतिभा सम्पन्न नहीं है। यद्यपि तीनों ही उच्च शिक्षा प्राप्त हैं ।
चाय के बीच जो बातचीत हुई उसमें विजय को मालूम हुआ कि इस तिकड़ी ने सुन्दर नगर के अन्दर एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी खोली है जिसका पूरा नाम के० एफ० जी० प्राईवेट डिटेक्टिव एजेंसी है।
प्राईवेट डिटेक्टिव एजेन्सी का बोर्ड कल लगाया गया था और आज ये एकलव्य के वंशज अपने गुरु के पास इसलिए आये थे कि वह उनकी उस प्राईवेट एजेन्सी का उद्घाटन नहीं कर सकता ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'
'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।
'हम धन्य भये ।' विजय ने कहा, 'लेकिन बच्चो अब तुम उठो । और हमें बताओ कि तुम किस देश से किस काम के लिए हमारी कुटिया में जो कि इस भयानक शोरगुल वाले जंगल राजनगर में अवस्थित है, आए हो। यह भयानक जंगल जिसमें कदम कदम पर तिरछी आँखों और टेढ़ी चालों वाले आदमी निकलेंगे। शोर मचाते हुए लोहे के बड़े-बड़े राक्षस हर वक्त भयानक जंगल में हर वक्त दौड़ते हैं। है मेरे बच्चो तुम इन सबसे बचकर हम तक कैसे आ गए। यह मुझे बताओ ।'
'हे गुरुदेव !' तीनों में से एक बोला, 'भारत में एक शहर है। सुन्दर नगर। हम तीनों वहाँ के वासी हैं।'
'हे मेरे बच्चो ! अब तुम उठो।' विजय ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, 'और मुझे अपना -अपना परिचय दो ।'
तीनों नमूने उठे ।
हाथ जोड़कर एक बार फिर उन्होंने विजय के सम्मुख मस्तिष्क झुकाया और फिर सीधे खड़े हो गए ।
शक्ल से तीनों ही सुन्दर थे और मूर्खता के कोई चिन्ह उनके मुख पर नहीं थे। तीनों ही सौम्य और भद्र पुरुषों का सा व्यक्तित्व दिखाने के लिए प्रयत्नशील लगते थे। लेकिन वे फिर भी नमूने थे इसमें विजय को कोई शक न था ।
विजय से यह बच्चे आयु में उससे कुछ छोटे ही थे किन्तु फिर भी बच्चे ही थे, बोला- 'बच्चो, तुमने मुझे अपना परिचय नहीं दिया ।'
'गुरुदेव, आप तो अन्तर्यामी हैं। आपको परिचय देना दीपक को सूरज दिखाने के बराबर है।'
विजय ने गर्दन हिलाकर कहा, 'सो तो है सो तो है। हम हम तुम्हारा परि-जानते हैं कि हम अन्तर्यामी हैं लेकिन मेरे बच्चो, हय तुम्हारे कमल मुखों से सुनना चाहते हैं।'
'तो फिर सुनिए ।' उन तीनों में से एक ने कहा, 'गुरुदेव, आपके इस दास को कुन्दन कबाड़ी कहते हैं। बाप इतना कुछ करता है कि बेटे को कुछ करने की आवश्यकता नहीं रहती यानि मैं कुछ नहीं करता । आक्सफोर्ड से पढ़कर आया है और वहाँ पर भी झण्डे गाड़-कर आया हूं। गुरुदेव, आश्चर्य की बात है कि वहाँ पर मैं क्रिकेट का खिलाड़ी था और एक ओवर में छह बार छक्के लगाए थे यानि थर्टी सिक्स रन इन एक ओवर ।'
'सिक्सटी रन इन एक ओवर और इन एन आवर ?' विजय ने पूछा ।
'इन ए ओवर गुरुदेव ।' कुन्दन कबाड़ी बोला ।
विजय ने उसकी यह गप्प सुनकर गर्दन हिलाई और बोला-'अब मुझे यकीन आ गया कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह बिल्कुल ठीक है। अब तुम अपना परिचय दो ।'
और अगला नमूना किसी रिकार्ड की तरह बोल उठा, 'हे उस्तादे खाला खादिम को फन्ने खाँ तातारी कहते हैं। किसी जमाने के मशहूर पहलवान और सुन्दर नगर के मौजूदा ताजिर जनाब बन्ने खाँ तातारी को मेरे अब्बा होने का फख्र हासिल है। हमारा खानदान तारीखी हैसियत रखता है गुरुदेव । हमारे खानदान का पहला आदमी मुन्ने खाँ तातारी पहले मुसलमान हमलावर मुहम्मद बिन कासिम के साथ आया था और उसे हिन्दुस्तान की सरजमीन इतनी अजीज लगी कि मुहम्मद बिन कासिम वापस चला गया किन्तु वह यहीं रह गया। फिर हिन्दुस्तान की ओर से हमारे खानदान ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं । मुन्ने खाँ तातारी हमारे ही खानदान का आदमी था जिसने उस समय सोलंकी भीमदेव के साथ सोमनाथ की हिफाजत करने का था। लेकिन अफसोस वहां महमूद गजनवी और ब्राह्मणों की साजिश भयानक रही और हम कुछ न कर सके । 1857 के गदर में भी हमारे खानदान ने हिस्सा लिया है। मुन्ने खां तातारी इन दस बहादुरों में से एक थे जो गदर के लिए मेरठ से देहली आये थे । उस बहादुर सिपाही ने मुल्क की खिदमत के लिए आजादी के दीवानों के सेनापति वस्त खाँ के साथ कन्धे से कंधा मिलाकर फिरंगियों का मुकाबला किया। उस बहादुर सिपाही ने मुल्क के लिए अपनी जिन्दगी की शमा गुल कर दी। लेकिन आजादी की ऐसी शमा जला गया जो तब से लेकर उस समय तक बड़ी शान से जलती रही जब तक कि मुल्क आजाद न हो गया। जब तक कि लालकिले पर फिरंगियों के नापाक यूनियन जैक के स्थान पर अपना प्यारा तिरंगा न लहराने लगा। बोलो प्यारा तिरंगा जिन्दाबाद ! फन्ने खाँ तातारी जिन्दाबाद ।
रिकार्ड फिलहाल समाप्त हो गया और विजय ने उसे दुबारा चालू करने की चेष्टा नहीं की क्योंकि उसे यकीन हो गया था कि वे लोग वास्तव में ही उसके चेले हैं और यह जगविदित सत्य है कि चेलों से गुरु भी पनाह मांगता है। उसने फन्ने खां तातारी को चुप ही छोड़कर अगले एवं अंतिम नमूने की ओर देखा और बोला, 'तुम क्या चीज हो भाई ?'
उन नमूने ने पहले अपना गाल खुजाया और फिर हल्का सा झापड़ लगाकर कहना शुरू किया, 'गुरुदेव, मैं ना चीज है। नाम हो गोकुल मदारी है किन्तु घर वाले प्यार से उल्लू की सवारी कहते हैं, क्यों कहते हैं यह गुझे नहीं मालूम। बस कहते हैं। आप जो चाहें मरजी कह सकते हैं। गुरुदेव है न ! जहाँ तक काम का सवाल है मैं कुछ नहीं करता । पिता जी इतना कुछ कर देते हैं कि मुझे कुछ करने की जरूरत ही नहीं रहती। हालत कुछ माननीय कबाड़ी जी से मिलती जुलती है। पिताजी के और व्यापार के अलावा मुख्य व्यापार वह भी है कि भारतवर्ष सत्तर के लगभग सिनेमा हाऊस उनके हैं।'
'यानि पेशा भी मदारी का ही है?' विजय ने पूछा ।
'आपने बिल्कुल ठीक समझा है गुरुदेव !' गोकुल मदारी ने उसका समर्थन करते हुए कहा, 'जैसे माननीय कुन्दन कबाड़ी का पेशा खानदानी है। जब सिनेमा नहीं थे तो हमारी बहुत नाटक मंडलियाँ और सरकस कम्पनियाँ थीं। जब सिनेमा आये तो सत्तर के लगभग सिनेमा हाऊस हमारे हैं। जब कभी भी आपको फिल्म देखने की इच्छा हो, पास मुझसे ले सकते हैं।'
गोकुल मदारी के खामोश होने पर विजय ने पूछा, 'क्या आपका परिचव समाप्त हो गया ?'
'जी फिलहाल समाप्त ही समझिए ।' गोकुल मदारी बोला-'क्योंकि गोकुल मदारी का परिचय तो यहीं समाप्त हो जाता है। इससे आगे तो केवल उल्लू की सवारी का परिचय रह जाता है जिसे आप...।'
'सुनाना पसन्द तो करूंगा लेकिन इस समय नहीं।' विजय ने कहा- 'मेरा ख्याल है कि मुझे तो अपना परिचय देने की जरूरत विल्कुल भी नहीं है।'
'बिल्कुल नहीं गुरुदेय !' तीनों ने समवेत स्वर में कहा, 'हम आपके बारे में बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।'
'यह सुनकर हम प्रसन्न भये।' विजय बोला, 'आइए अब गुरुदेव विजय अपने अनजाने शिष्यों का यानि तुम लोगों का स्वागत करते हैं। आइए स्वागतम !'
और तीनों नमूनों ने फिर समवेत स्वर में कहा 'हे गुरुदेव ! धन्य भाग तुम्हारे नहीं हमारे जो हम यहां पधारे ।'
विजय ने अनुभव किया कि तीनों युवक उसके पदचिन्हों पर चल रहे हैं। साथ ही उसने यह भी महसूस किया कि तीनों में कोई भी कुछ विशेष प्रतिभा सम्पन्न नहीं है। यद्यपि तीनों ही उच्च शिक्षा प्राप्त हैं ।
चाय के बीच जो बातचीत हुई उसमें विजय को मालूम हुआ कि इस तिकड़ी ने सुन्दर नगर के अन्दर एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी खोली है जिसका पूरा नाम के० एफ० जी० प्राईवेट डिटेक्टिव एजेंसी है।
प्राईवेट डिटेक्टिव एजेन्सी का बोर्ड कल लगाया गया था और आज ये एकलव्य के वंशज अपने गुरु के पास इसलिए आये थे कि वह उनकी उस प्राईवेट एजेन्सी का उद्घाटन नहीं कर सकता ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें