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Saturday, November 4, 2017

प्यारे लाल आवारा - संस्मरण

प्यारे लाल 'आवारा ' - संस्मरण

इलाहाबाद के कीडगंज में निवास और प्रकाशन था । अत्यन्त निर्धन , बैकवर्ड क्लास परिवार में जन्म हुआ था।
      सिरकी  बाँस को छीलकर उसके परदे बनाना उनके परिवारी जनों का कार्य था। जब मैं उनके सम्पर्क में आया तो वे बी.ए. पास, चालीस साल के करीब सुखी परिवार वाले थे, पर बहुत अमीर नहीं।
   रूपसी प्रकाशन, बिरहाना रोड, कीडगंज , इलाहाबाद पता लिखा जाता था। उस दौर में निकलने वाले नाॅवल,जासूसी सामाजिक सभी मैगज़ीन कहलाते थे। हर माह निश्चित तिथि को निकलते थे। ज़रूरी इसलिए होता था क्योंकि पोस्टल सुविधा प्राप्त होती थी। बंडल बनाकर,पोस्ट आफिस से आए बैगो में भरकर, रिक्शे पर लादकर पोस्ट आफिस ले जाने कि प्रक्रिया अपनाई जाती थी । एक रूपया पच्चीस पैसे व पचहत्तर पैसे, इस दो कैटेगरी में मैगजीन होती थी।  प्यारे लाल जी के यहाँ से एक उनका लिखा उपन्यास हर माह रूपसी(पत्रिका) में निकलता था, दो अन्य पचहत्तर पैसे वाली मैगज़ीने -- रहस्य व रोमांच होती थी।
       प्यारे लाल जी खुद प्रकाशन के काम में दखलअंदाजी करना पसन्द न करते थे। मालिक वे ही थे, पर सारा काम उन्होंने अपने छोटे भाई श्याम लाल को सौंप रखा था। वे सुबह आठ बजे सोकर उठने के बाद नीचे आफिस में आते थे । आफिस,एक तरह से उनकी बैठक थी। जब तक वे बैठक में हैं,बैठक चलती रहती थी। बैठक खाली है तो मानिये प्यारे लाल जी नहीं है। रिक्शे पर घूमने, मिलने- जुलने निकल गये। निकल गये तो निकल गये, कोई बता नहीं सकता कि कब आयेंगे।  रिक्शे के अलावा कोई और सवारी का साधन उन दिनों न था। कार, स्कूटर ,मोटर साइकिल...राम का नाम लीजिए , या तो साईकिल कुछ अच्छी हैसियत तो रिक्शा । मैं सन् साठ- पैंसठ की बात कर रहा हूँ। बड़े सादा मिजाज़, लम्बे बाल पीछे को काढ़े हुए। एक बार कंघा मारकर ऊपर से उतर आए तो फिर सारा दिन हाथ से या झटककर बालों को ऊपर ले जाने का खुद का स्टाइल।  चौड़ी मोहरी का पायजामा, लम्बा साफ़-सफ़्फाफ़ कुरता, पैरों में काली, अँगूठे वाली चप्पल । सफेद कुरते- पायजामे से हमेशा एक सा प्यार। कभी किसी और पोशाक में नहीं देखा । घर- आफ़िस में हैं तो लिज़मिज़ा कुरता- पायज़ामा भी चलेगा।  बाहर जा रहें हैं तो इस्त्री युक्त। कपड़े घर मे धुलते थे, इसकी सनद यह की बालकनी मे हर दिन धुला कुरता- पायजामा एक जोड़ी सूखता नज़र आता था। कुरता- पायजामा मोटे सूत का। जाड़े में भी वही पोशाक, अलबत्ता बस खादी की जैकेट का इज़ाफा हो जाता था।
     ‌कद लम्बा, छ: फुट से निकलता हुआ,  दो-तीन इँच ऊपर । सनद यह है कि जब उनके करीब जाकर खड़ा होता तो उनके कंधे तक खुद को आँकता।
    जब मैं उनके पास जाता-आता था तो एक नौ-दस वर्षीय पुत्री के पिता थे। पुत्री का नाम नीता। मैं सुबह आठ बजे पहुँचा नहीं कि वे उतरकर आ रहे होते या मिनट दो मिनट बाद आ जाते। गुरू- शिष्य की गरिमा युक्त औपचारिकता का निर्वाह। मेज के पीछे हमेशा एक जगह मौजूद कुर्सी पर आसीन होते ही हल्की आवाज़ में पुकार--" श्याम... "
और मैंने हाथ बढ़ाकर कहा--" मैं लाता हूँ। "
उन्होंने नोट बढ़ाया और मैं सिगरेट लेने के लिए क़दम बढ़ाए। विल्स सिगरेट पीते थे। मैंने पैकेट लाकर दी , सिगरेट शुरू।
फिर आवाज़ दी,"नीता "
नीता चाय के दो कप के साथ हाज़िर। एक कप मेरी ओर बढ़ाई , दूसरी खुद शुरू। इस तरह शुरू हुई गुरू जी की दिनचर्या। रात को लिखते थे। कभी सारी-सारी रात, इस बात की चुगली उनकी सुबह आँखों की सुर्खी, सोई- सोई आँखें कर देती थीं। शाम को सिविल लाइन स्थित काफी हाउस में जाना ज़रूरी होता था। उस दौर में सैकड़ों साहित्यकार के रूप मे ख्याति प्राप्त हो, लुगदी साहित्य का यशस्वी कथाकार हो, कवि हो या राजनीति का नया-पुराना खिलाड़ी...काफी हाऊस में देखा जाना शान की बात समझता था ।....आगे फिर कभी..

@ आबिद रिजवी जी के स्मृति कोष से।

आबिद रिजवी©
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