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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

4. अजिंक्य शर्मा- साक्षात्कार

मेरी कोशिश है कि मैं पाठकों के लिये मौलिक और बेहतरीन लिखूं -अजिंक्य शर्मा
साक्षात्कार शृंखला-04

साहित्य देश ब्लॉग के साक्षात्कार स्तम्भ के अन्तर्गत लोकप्रिय जासूसी साहित्य की श्रेणी में छतीसगढ के युवा उपन्यासकार अजिक्य शर्मा जी का साक्षात्कार प्रस्तुत है।‌
अजिंक्य शर्मा जी का मूल नाम ब्रजेश शर्मा है और इनके अब तक तीन उपन्यास क्रमशः 'मौत अब दूर नहीं', 'पार्टी स्टार्टेड नाओ' और 'काला साया' किंडल पर प्रकाशित हो चुके हैं। इनके उपन्यास शीघ्र ही हाॅर्डकाॅपी के रूप में पाठकों को उपलब्ध होंगे।
अपने तीन उपन्यासों के दम पर इन्होंने पाठकवर्ग में एक विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है। 

अजिंक्य शर्मा
1. सबसे पहले आप अपना परिचय दीजिएगा।
-    मेरा नाम ब्रजेश कुमार शर्मा है। वर्तमान में मैंने अजिंक्य शर्मा के पैन नेम से उपन्यास लिखना आरम्भ किया है और मुझे कहते हुए हर्ष का अनुभव हो रहा है कि मेरे इस प्रयास को पाठकों की भरपूर सराहना भी मिल रही है। मैं छतीसगढ़ के महासमुन्द नामक एक छोटे से नगर में रहता हूं और वर्तमान में यहां के एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्र में कार्यरत हूं। उपन्यास लेखन मैंने एक शौक के रूप में आरम्भ किया लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि पाठकों का इतना प्यार और विश्वास मिलेगा। पाठकों के इसी प्यार और विश्वास से प्रेरित होकर मैं आगे भी और भी अच्छा लिखने का प्रयास करूंगा।

2. आपने अपने वास्तविक नाम 'ब्रजेश शर्मा' के स्थान पर पैन नेम 'अजिंक्य शर्मा' के नाम से क्यों लिखना पसन्द किया?
- ये प्रश्न मुझसे मेरे सभी मित्र एवं पाठकगण पूछते हैं। दरअसल पैन नेम के रूप में दूसरे नाम से लिखने का कारण ये है कि मेरी दिलचस्पी विभिन्न विधाओं में लिखने की है। जासूसी थ्रिलर तो लिख ही रहा हूँ लेकिन साइंस फिक्शन में भी मेरी गहन रुचि है। हिन्दी में साइंस फिक्शन उतने लोकप्रिय भी नहीं हैं तो सम्भवतः इंग्लिश में लिखूं। इसी विचार से मैंने 'अजिंक्य शर्मा' के पैन नेम से लिखना शुरू किया। साइंस फिक्शन ब्रजेश कुमार शर्मा के नाम से ही आएगा लेकिन उसमें अभी काफी समय है। वैसे भी पाठकों की ही राय के अनुसार मेरा पैन नेम ही काफी पसन्द किया जा रहा है। इस स्नेह के लिये मैं सभी पाठकों का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूं।

3. उपन्यास लेखक की तरफ झुकाव कैसे हुआ?
-     इस बारे में मैंने अपने पहले उपन्यास 'मौत अब दूर नहीं' के लेखकीय में थोड़ी चर्चा की थी। दरअसल मैं बचपन से ही उपन्यास पढ़ने में मेरी काफी रुचि रही है और इस रुचि के कारण ही मैं कब लेखन की ओर आकृष्ट हो गया, इसका पता ही नहीं चला। अब माँ सरस्वती की कृपा से हिंदी लोकप्रिय साहित्य की सेवा करने का अवसर मिला है तो मैं अपनी पूरी क्षमता से इस कार्य में जुट गया हूं। पाठकों का भरपूर प्यार और प्रोत्साहन तो मिल ही रहा है। एक लेखक को और क्या चाहिये?

4. आपके अब तक तीन उपन्यास आये हैं और सभी में साइको पात्र हैं, इसकी कोई वजह? 

अजिंक्य शर्मा जी का एक लेखकीय

अजिंक्य शर्मा जी के उपन्यास 'मौत अब दूर नहीं' के लेखकीय से

प्रिय पाठकों, 
        अपना पहला उपन्यास लेकर आपकी सेवा में प्रस्तुत हूं। ये नॉवल मूलरूप से ये एक मर्डर मिस्ट्री और थ्रिलर का संगम ही है और कुछ नवीनता लाने की भी कोशिश की है हालांकि ये कोशिश कितनी सफल रही, इसका निर्णय तो आपको ही करना होगा। 
        ‌दोस्तों, मैं ये कहने से भी अपने आपको नहीं रोक पा रहा हूं कि एक वक्त था, जब मुझे ऐसा लगने लगा था कि अब हिन्दी जासूसी उपन्यासों का दौर खत्म हो गया। जासूसी उपन्यास बीते कल की बात हो गए। वर्षों तक उपन्यास जगत के महान उपन्यासकारों के अनेक उपन्यास पढऩे के बाद मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। लेकिन जो चीज मुझे इस पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर रही थी, वो ये थी कि जिस शहर में मैं रहता हूं, वहां उपन्यासों का न मिलना। यहां एक भी दुकान पर उपन्यास उपलब्ध नहीं होते। बहुत से लोग उपन्यासों के बारे में जानते ही नहीं। जो गिने-चुने लोग जानते हैं, उनमें से भी ज्यादातर उपन्यासों को अच्छा नहीं समझते। घटिया स्तर की किताबें मानते हैं। 
        मैं स्वयं एक दिन एक पार्क में बैठा एक उपन्यास पढ़ रहा था तो अचानक एक बुजुर्गवार आए और उपन्यास पढऩे के लिए मुझे जमकर फटकार लगाने लगे। क्यों? क्योंकि उनकी राय में उपन्यास पढऩा अच्छा नहीं होता। क्यों अच्छा नहीं होता? ये मैंने उनसे पूछा नहीं लेकिन हम लोग समझ सकते हैं कि ऐसी विचारधारा के पीछे क्या वजह हो सकती है। वजह थी कुछ ऐसे उपन्यासों का चलन, जिनमें सचमुच कुछ भी बेसिरपैर की कहानी और अनावश्यक रूप से अश्लीलता आदि परोस दी जाती थी। लेकिन ऐसा सिर्फ उपन्यासों में ही तो नहीं होता है। फिल्म जगत में भी तो कई बड़े-बड़े प्रोडक्शन्स की ऐसी फिल्में आईं है-और आती रहती हैं-जिनमें स्टोरी के नाम पर बकवास और जबरन की अशलीलता होती है। लेकिन फिल्में देखने तो लोग जाते हैं। फिल्में तो उपन्यासों की तरह खत्म होने के कगार पर नहीं पहुंची हुईं हैं। फिर उपन्यासों के साथ ही इस तरह का भेदभावपूर्ण रवैया क्यों? 
          विदेशों में क्यों आज भी नॉवेल्स उतने ही मकबूल हैं? उतने ही पसंद किए जाते हैं? और भारत में बिकने वाले नॉवेल्स से कई-क्ई गुना अधिक दामों पर भी हाथों-हाथ बिक जाते हैं? शायद इसलिए क्योंकि हमारे देश में लोग क्वालिटी पर नहीं क्वांटिटी में अधिक भरोसा करते हैं। फिल्म में कहानी-भले ही वो बेसिरपैर की ही क्यों न हो, मैं सारी फिल्मों की बात नहीं कर रहा, उसी तरह जिस तरह सारे उपन्यास बकवास नहीं होते-हीरो, हीरोइन, मारधाड़, रोमांस, ऑडियो-विजुअल इफैक्ट्स यानी मनोरंजन की कई सारी चीजें एक साथ उपलब्ध होती हैं। ऐसे में कहानी पसंद नहीं आती तो हो सकता है दर्शक को गाने पसंद आ जाएं, गाने भी पसंद न आएं तो हो सकता है हीरो-हीरोइन पसंद आ जाएं, वो भी पसंद न आएं तो हो सकता है कि फिल्मांकन मात्र ही पसंद आ जाए, सीनरी ही पसंद आ जाए। 
        यहां मैं ये भी कहना चाहूंगा कि उपन्यासों में जिस अशलीलता को इतना बुरा समझा जाता है, पर्दे पर लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं। यानि फिल्म की कहानी, गाने वगैरह पसंद न भी आएं तो भी नायिका या सहनायिका के उत्तेजक हाव-भाव, कुछ गर्म सीन फिल्म को चला देने की क्षमता रखते हैं। लेकिन वो चीज उपन्यासों में होती है तो उपन्यासें बदनाम हो जाती हैं। निकृष्ट हो जाती हैं। समाज को बिगाडऩे का काम करने लगती हैं। ऐसा क्यों? 
         ‌‌‌ऐसा कह कर मैं उपन्यासों में अश्लीलता का समर्थन नहीं कर रहा हूं-मेरे स्वयं के नॉवल में मैने इससे बचने की पूरी कोशिश की है-बल्कि मैं ये कहने की कोशिश कर रहा हूं कि उपन्यासों के साथ ऐसा भेदभावपूर्ण रवैया आखिर क्यों अपनाया जाता है? 
     खैर, इस विषय पर तो चर्चा बहुत ही लम्बी हो सकती है और पहले मैं इस मुद्दे पर प्रबुद्ध पाठक वर्ग के विचार जानना चाहूंगा। अपने आसपास के परिवेश से मुझे ऐसा अहसास होने लगा था कि हिन्दी जासूसी उपन्यासों का दौर लगभग खत्म हो चुका है। मेरे पूरे शहर में एक भी लाइब्रेरी नहीं है। उनकी जगह कुकुरमुत्ते की तरह मोबाइलों की दुकानें खुल गईं हैं। कुछ बड़े रेलवे स्टेशनों के बड़े बुकस्टॉल पर भले ही कुछ उपन्यास उपलब्ध हो जाएं वरना डेढ़-दो दशक पूर्व तक वो जो लाइब्रेरियां हुआ करती थीं, जिनमें उपन्यासों, कॉमिक्सों के भण्डार हुआ करते थे, उनके दर्शन अब दुर्लभ ही हो गए हैं। 
        बनइसी दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से मैं श्री राजू जाचक से मिला, जो कि न सिर्फ एक प्रबुद्ध पाठक हैं बल्कि पाठकवर्ग को जोडऩे की दिशा में भी उन्होंने अद्भुत कार्य किया है, जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में मैं स्वयं आपके बीच उपस्थित हूं। इस बेशकीमती तोहफे के लिए मैं राजू भाई का विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहूंगा। उन्होंने मुझे सोशल मीडिया में पुस्तकप्रेमी वर्ग से परिचित कराया। तब मैंने जाना कि लोगों ने उपन्यासों को पूरी तरह भूला नहीं दिया है। अब भी लोग उपन्यासें पढ़ते हैं। लोगों में उपन्यासों, कॉमिक्सों के प्रति प्रेम अब भी बरकरार है। रोमांचक कथानक के लिए पन्ने पलटने का जुनून, वो दीवानगी अब भी लोगों कायम है।
         साथ ही मैं सर्वश्री हीरा वर्मा, किरन चौधरी, चन्दन छविन्द्र, धर्मेन्द्र त्यागी, स्वीट विक्की जो सचमुच में बहुत स्वीट हैं, राशिद भाई, सतेंद्र सिंह, मुकेश देवरानी सर, दिग्विजय सिंह, मनीष भाई सहित सोशल मीडिया के अपने सभी दोस्तों का भी आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जो मेरे प्रेरणास्त्रोत बने। सभी दोस्तों के नाम यहां लिखूंगा तो दस पन्ने तो भरने तय हैं। वैसे भी दोस्तों का मुकाम दिल में होता है, जबान पर उनका नाम हो या न हो।
    ‌‌‌‌ कुछ नए उभरते हुए उपन्यासकारों से भी मुझे प्रेरणा मिली हालांकि उनकी समानता कर पाने लायक मैं खुद को नहीं समझता। और पुराने उपन्यासकार तो प्रेरणा के स्त्रोत रहे ही हैं। इस शेर ने भी मुझे बहुत मुतमईन किया, जो सच्चाई भी बयां करता है और आंखों में नमी भी ला देता है- ‘कागज की महक ये नशा रूठने को है, ये आखिरी सदी है किताबों से इश्क की।’ तो अब ये जिम्मेदारी पाठकों के साथ-साथ हम लेखकों पर भी आयद होती है कि हम कागजों की महक को बरकरार रखने की कोशिश करें, इस नशे को न भूलने दें, इसे किताबों की आखिरी सदी न बनने दें। (वैसे इसे विसंगति ही कहा जाएगा कि ये बात एक ऐसा शख्स कह रहा है, जिसकी खुद की किताब ई-बुक के रूप में प्रकाशित हो रही है, कोई हार्डकॉपी के रूप में नहीं) और इसमें हम कितना कामयाब रहते हैं, इसका फैसला तो आने वाला वक्त ही करेगा। नॉवल पढऩे के पश्चात मुझे अपनी अमूल्य राय से अवश्य अवगत कराएं। 
 ajinkyasharma181@yahoo.in 
आपके पत्रों की प्रतीक्षा में।  

आपका अपना -
अजिंक्य शर्मा

अजिंक्य शर्मा- परिचय



नाम- अजिंक्य शर्मा (लेखकीय नाम)
नाम-   ब्रजेश कुमार शर्मा (मूल नाम)
माता- 
पिता- 
जन्मतिथि-13.06.1990
पता- BTI रोड, महासमुंद,       
  छतीसगढ़

सम्पर्क- ajinkyasharma181@yahoo.co


उपन्यास सूची- (उपन्यास समीक्षा पढने के लिए उपन्यास शीर्षक पर क्लिक करें)
  1. मौत अब दूर नहीं     (25 अक्टूबर 2019)
  2. पार्टी स्टार्टेड नाओ   (31 जनवरी 2020)
  3. काला साया           (अप्रैल 2020)
  4. दूसरा चेहरा
  5. अनचाही मौत
  6. ब्रेकिंग न्यूज- वहशी कातिल
  7. द ट्रेल               (द ट्रेल सीरीज)
  8. द ट्रायो             (द ट्रेल सीरीज)
  9. निमिष             (साइंस फिक्शन थ्रिलर)
  10. वतन के रखवाले


अजिक्य शर्मा- परिचर्चा

अजिंक्य शर्मा- परिचर्चा
नमस्कार,
साहित्य देश इस बार पाठकों के लिए लेकर आया है नव लेखक अजिंक्य शर्मा जी से संबंधित विस्तृत जानकारी। उनका परिचय, उपन्यास सूची, साक्षात्कार और उनके प्रथम उपन्यास का लेखकीय


       छतीसगढ के महासमुन्द में जन्म ब्रजेश शर्मा जी को बचपन से ही कथा-कहानियां पढने का शौक था। विद्यालय शिक्षा और उम्र के साथ-साथ यह शौक भी जवान होता चला गया।
लेखक के चलते शिक्षा के साथ-साथ इन्होंने एक साप्ताहिक पत्र में काम करना भी आरम्भ कर दिया। लेकिन अंदर कहीं न कहीं एक जासूसी लेखन करवटें ले रहा था। सोशल मिडिया मित्रों के संपर्क में आने के पश्चात इन्हें कुछ उपन्यास पाठक मिले तो इन्होंने भी लेखन में हाथ आजमाया।
       EBook का समय था, इधर लिखा और उधर प्रकाशित हुआ। इनकी पहली रचना 'मौत अब दूर नहीं' को पाठकों का भरपूर प्यार मिला। यही प्यार फिर आगामी उपन्यासों का आधार बना।
अजिंक्य शर्मा जी ने मर्डर मिस्ट्री के साथ-साथ स्लैशर जैसे कथानकों की भी हिन्दी जासूसी साहित्य में नीव डाल दी। वहीं मर्डर मिस्ट्री में भी कुछ नये प्रयोग इनके उपन्यासों में दृष्टिगत होते हैं।
पुलिस की सकारात्मक छवि प्रस्तुत करना, वर्तमान परिस्थितियों को उपन्यासों में स्थान देना आदि इनके उपन्यासों में देखा जा सकता है।

हम लेखक के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
लेखक के विषय में अन्य जानकारी निम्न लिंक पर उपलब्ध है।

1. परिचय / उपन्यास सूची 
लेखक- अजिंक्य शर्मा
2. साक्षात्कार
3. उपन्यास लेखकीय
4. उपन्यास समीक्षा
उपन्यास चित्र



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