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शनिवार, 9 जून 2018

मेरी प्रथम उपन्यास यात्रा- द्वितीय भाग

मेरी प्रथम उपन्यास यात्रा (द्वितीय भाग)
दिल्ली से मेरठ की ओर...

तीन बजे कंबोज जी  से रवानगी ली।
दिल्ली से मेरठ का साठ किलोमीटर का सफर कर हम मेरठ पहुंचे। 
शास्त्री नगर, मेरठ। 
          वह शास्त्री नगर जिसका नाम‌ उपन्यासों में पढा। आबिद रिजवी, वेदप्रकाश शर्मा, गजाला करीम जैसे लेखकों का गढ शास्त्री नगर। कुछ नामवर और कुछ गुमनाम लेखकों का शास्त्री नगर, लेखकों का और पाठकों का शास्त्री नगर।
             मेरठ शहर उपन्यास जगत की कर्मस्थली रहा है। मेरठ उपन्यास जगत का एक शरीर है तो शास्त्री नगर उसका दिल है। मैं आज उसी दिल में था। कभी ख्वाब था मेरठ जाने का। वह ख्वाब पूरा हो गया।     
         ‌ आबिद रिजवी साहब के घर पहुंचे। किताबों से भरा उनका कमरा, जहाँ वो अपना लेखन कार्य करते हैं, उनके सोने का कमरा, वह तो और भी ज्यादा किताबों से भरा हुआ था। नयी पुरानी, व्यवस्थित-अव्यस्थित, साहित्यिक- असाहित्यिक किताबे, जो असंख्य थी। अभी चाय पी ही थी की उपन्यास लेखिका बहन गजाला करीम जी की बड़ी बहन शबाना जी आ पहुंचे।  शबाना जी भी घोस्ट राइटिंग के लिए लेखन कर चुकी हैं। लेकिन अब सामान्य बुक्स लिखती हैं।
    
बहन गजाला जी के साथ
 
  उनके कुछ समय पश्चात स्वयं गजाला जी भी आ पहुंचे। वो घर से स्पेशल 'मैंगो जूस' लेकर आये थे। शीतल,स्वादिष्ट।
        "भैय्या मुझे कब से आपका इंतजार था। अब तो आप ईद तक यहीं रुकोगे।"- वह अपनी चंचल जुबान से लगातार बोल रही थी। " मैं तो अम्मी से बोल कर आयी हूँ। भैय्या यहाँ अपने साथ ईद मनायेंगे।"
        "अरे! अभी तो पहुंचा हूँ। और आपने फरमान पहले ही सुना दिया।"
        "अब तो बहन की ही चलेगी।"
        "अच्छा, भाई कब से आया है और बहन अब, इतनी लेट पहुंची?"
        "आपके लिए, घर पर शाम के खाने की व्यवस्था कर के आयी हूँ, अब आप मेरे साथ घर चलोगे।"
        यह बातों का दौर चलता रहा।
     एक लंबा दौर चला पारिवारिक बातों से लेकर उपन्यास जगत की दुनियां तक का। 
     मैं कमरे में बैठा आबिद जी की किताबों को निहार रहा था। मुख्य कमरे में लगे काँच से दूसरे कमरे में उपस्थिति किताबें दिखाई देती थी। 
     "रिजवी साहब, आप तो मेरे विचार से किताबों के साथ उठते, बैठते और सोते हैं?"-मैंने कहा।
     " हाँ, मेरा जीवन तो इन्हीं किताबों में बीता है।"
     "इसीलिए तो आपके कमरों‌ में किताबें ही किताबें दिखाई देती हैं।"-मैंने हँसते हुए कहा।
     " भैय्या"-गजाला ने धीरे से रहस्यम आवाज में कहा।
     मैंने उनकी तरफ देखा, तो उन्होंने कमरे में उपर बनी अलमारी की तरफ इशारा किया। 
     कमरे में उपर छत को स्पर्श करती एक अलमारी थी, जिसके आगे लकड़ी का कपाट था। लगभग तीन फुट की उंचाई और कमरे के जितनी लंबाई थी। उस अलमारी को खोल कर देखा तो मैं स्वयं हैरान रह गया। आश्चर्यचकित । वह अलमारी उपन्यासों से  भरी हुयी थी। चारों तरफ उपन्यास ही उपन्यास। यह जलवा था आबिद जी का। इसके अलावा और भी बहुत सी किताबें वहाँ उपलब्ध थे।
आबिद जी के उपन्यासों की एक छोटी सी झलक
             आबिद जी, जिन्होंने कभी अपने बारे में कुछ नहीं कहा। एक बार बातचीत में आबिद जी ने कहा था "मैं चलता रहा और पीछे के निशान मिटते रहे।" 
             यह शाम गजाला बहन के घर बीती। सभी के साथ आत्मिक स्नेह के साथ। सारा परिवार ऐसा था, जैसे पहले से ही परिचित हो।
             गजाला जी का कक्ष। उनका काॅफी कलर का राइटिंग टेबल, जिस पर बहुत से उपन्यास सजे हुये थे। गजाला जी के घर ले सदस्यों का स्नेह युक्त व्यवहार देख कर ऐसे लगता था जैसे उनसे पहले का परिचय रहा हो।
                 यह संयोग ही था उस शाम उनका पूरा परिवार वहाँ उपस्थित था। 
                     कुछ समय बाद हम आबिद जी के घर पर उपस्थित थे।  अब सुबह के कार्यक्रम की हमने रूप रेखा तय की। रात काफी हो चुकी थी। सारे दिन की थकान थी। मैं सोते ही नींद की प्यारी गोद में चला गया।
    *शुभरात्रि* 
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दिनांक 4.06.2018 सुबह पांच बजे आँख खुल गयी। कुछ समय आबिद रिजवी जी के घर के सामने पार्क में घूमता रहा, कलरव मनमोहक था।
          आज विचार था कुछ लेखकों‌ से मिलने का और उसी का विचार मन में‌ बुनता रहा।
 तभी गजाला जी भी बाहर आ गये थे।
         "Good Morning"
         "गुड़ माॅर्निग भैय्या"- प्रतिउत्तर मिला-"आप तो लगता है जल्दी उठ गये। आपको कमरे में देखा,  दिखाई न दिये। आपकी चाय ठण्डी हो जायेगी। आप चाय पिओ मैं घर जाकर आती हूँ।"          
            चाय- नाश्ता से निवृत्त होकर रिजवी जी ने मनेष जी को फोन किया और उनके आॅफिस में मिलने का विचार बनाया।
कुछ समय बाद मनेष जी का फोन आया की वो रिज़वी साहब के घर आ रहे हैं।
समय व्यतीत हुआ।
स्नान किया।
तब तक पुन: नाश्ता मेज पर आ चुका था।
मनेष जी को पुन: फोन किया की हम आपके आॅफिस आ रहे हैं।
   कुछ समय बाद मनेष जी का पुन: फोन आया की वो शास्त्री नगर की तरफ आ रहे हैं तो आबिद रिज़वी साहब के घर पर मिल लेंगे।
       अब इंतजार था.....
नाश्ता अभी समाप्त किया और इस बार मैंने मनेष जी को फोन करने का सोचा ही था की‌ मनेष जी दरवाजे पर नजर आये।
एक मुस्कुराता हुआ चेहरा...गर्मजोशी से मिले।
मनेष जी भी नाश्ता लेकर आये थे। अभी पेट भरा हुआ था लेकिन मनेष जी के स्नेह को मना भी नहीं किया जा सकता था।
फिर एक-एक कप चाय के बाद चला उपन्यास जगत की वार्ता का एक लंबा दौर।
रोचक किस्से... लेखकों की दिलचस्प कहानियाँ... आबिद जी के संस्मरण..... मनेष जी के प्रकाशन की चर्चा....और मेरे और गजाला करीम‌ के प्रश्न........आबिद जी और मनेष जी का एक-एक प्रश्न पर विस्तार से उत्तर। 
                मेरी इच्छा थी मनेष जी की संस्था रवि पॉकेट बुक्स देखने की। 
शास्त्री नगर से हरि नगर पहुंचे। मनेष जी, गजाला करीम और मैं। 
    आॅफिस के बाहर ही नाम चमक रहा था 'रवि पॉकेट बुक्स'।
रवि पॉकेट बुक्स कार्यालय
मनेष जैन जी अपने कार्यालय में
             काँच का दरवाजा पार करके जब अंदर पहुंचे तो चारों तरफ किताबें ही किताबें और किताबें ही थी। एक पाठक को और क्या चाहिए। जैसे भूखे इंसान को भोजन ठीक वही दशा मेरी थी। उन किताबों को देखने की, छूने की और पढने की‌ अदम्य इच्छा।
   मनेष जी ने हमें‌ बैठने का इशारा किया।
            मैं‌ अनमने ढंग से बैठा, पर मेरा मन किताबों में ही था। मनेष जी‌ ने चाय का आॅर्डर दिया तो मैंने कहा 'मनेष जी चाय आने तक मैं एक बार आपका कार्यालय देख लूं।"
मनेष जी, सरल स्वभाव, कार्यशील व्यक्ति तुरंत साथ चल दिये। एक-एक रैंक पर ठहरते और विभिन्न किताबों की जानकारी देते रहे। 

    साहित्यिक, उपन्यास, कम्प्यूटर, विज्ञान, अंग्रेजी-हिंदी, सामान्य बुक्स न जाने कितनी श्रेणी की किताबें वहाँ थी।
  मनेष जी किसी कार्य से पुन: अपने केबिन में चले गये और मैं और गजाला करीम जी पुन: पुस्तकों के खजाने में‌ खो गये।
मनेष जी का केबिन, फिर उसके साथ एक एक कमरा और फिर उसी कमरे में‌ सामने एक और कमरा। जब हम उस कमरे में पहुंचे तो वहाँ बहुत से उपन्यास रखे हुये। मुझे लगा मेरी यात्रा सफल हो रही है। रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित वर्तमान उपन्यासों का ढेर लगा था। 
रवि पॉकेट बुक्स कार्यालय में लगा उपन्यासों का ढेर।
    मैं एक -एक उपन्यास को देख रहा था, छू रहा था और याद कर रहा था उपन्यास जगत के उस सुनहरे दौर को। वह वक्त भी कितना भाग्यशाली था जब उपन्यास के ढेर लगे होते थे।
   " भैय्या, यह तो कुछ भी नहीं अभी गोदाम में देखना और भी बहुत से उपन्यास वहाँ पड़े हैं?
                "अभी गोदाम और बाकी है!" मैंने आश्चर्य से कहा-"वह कहां है?"
                "पास ही है, अपने वहां चलेंगे।"
                "हां।"
             मुझे लंबे समय से तलाश थी गौरी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक 'बसंत कश्यप' की। गौरी पॉकेट बुक्स के प्रकाशन अधिकार अब रवि पॉकेट बुक्स के पास हैं। इसके अलावा और भी कई प्रकाशन संस्थानों के प्रकाशन अधिकार रवि पॉकेट बुक्स के पास है।
  ‌मनेष जी ने तुरंत गौरी पॉकेट बुक्स वाला बण्डल‌ मंगवाया। एक.....दो....तीन......तीसरे बण्डल में‌ बसंत कश्यप का एक उपन्यास मिला 'नायक' नामक। जिस उपन्यास की खोज थी वह तो न मिला पर जिसकी कोई चर्चा तक न थी वह मिला। पर जो मिला अच्छा मिला, इअ पर बसंत कश्यप जी का एड्रेस भी है।
          चाय नाश्ते का दौर चला और साथ में चली उपन्यास जगत की चर्चा।
  मनेष जी ने बहुत सी महत्वपूर्ण बातें‌ शेयर की। अनिल‌ मोहन जी के उपन्यास 'नफरत की दीवार', सुरेन्द्र मोहन‌ पाठक जी के उपन्यास 'ओवरडाॅज' की स्क्रीप्ट देखना भी स्वयं में रोचक था।
"कुछ दिन पूर्व जब कुछ कागज देख रहा था तो एक और स्क्रिप्ट मिली।"- मनेष जी ने कहा।
" किस की थी।"- मैंने उत्सुकता दिखायी।
हँसते हुए कहा- "मोहन‌ मौर्य जी की।  काफी समय पहले आयी थी। उपन्यास का दौर न रहा तो प्रकाशित न हो पायी।"
"तो ऐसी और भी बहुत सी स्क्रिप्ट होगी जो कभी प्रकाशित न हो पायी हो?"
"हाँ, एक समय तो तब बहुत से लेखक आते थे। किसी को‌ मना  तो किया नहीं जा सकता था। बस उनकी स्क्रिप्ट रखी ही रह जाती है।"
मोहन मौर्य, 'एक हसीन कत्ल' उपन्यास के लेखक।
   चाय का दौर समाप्त कर हम गोदाम पहुंचे। गोदाम काफी बड़ा था। जिसमें असंख्य किताबें भरी पड़ी थी।  हर तरफ किताबे -किताबे और किताबें। मैं आश्चर्य से देखता रहा।
        "भैय्या, यह तो कुछ भी नहीं अभी और भी बाकी हैं।"
        "अभी और....कहां?"
        मनेष जी और गजाला मेरे आश्चर्य पर मुस्कुरा रहे थे। इस गोदाम के साथ लगता एक और बड़ा, काफी बड़ा हाॅल था। वह हाॅल भी गोदाम के रूप में प्रयुक्त होता था। जिसमें नीचे फर्श पर किताबों के बड़े-बड़े ढेर लगे थे।
        इस गोदाम को दो भागों में विभक्त किया गया था। फर्श और फिर बीच में लकड़ी के छत थी जो आधे गोदाम पर छाती हुयी थी। उस छत पर उपन्यासों के बंडल पडे़ थे।
गोदाम में उपलब्ध उपन्यास
मनेष जैन जी से मिला उपहार
          अभी तो और भी बहुत कुछ बाकी है। एक और कमरा था, हालांकि वह छोटा था, लेकिन वह भी भरा हुआ था, आप सोच रहे होंगे उसमें भी किताबें होंगी, नहीं। उसमें किताबें नहीं, बल्कि किताबों के आवरण (कवर पेज) थे। सोचिए,एक कमरा सिर्फ आवरण पृष्ठों से भरा हुआ था।
            एक कल्पना कीजिएगा, उस दौर की जब उपन्यासों का सुनहरा दौर था, तब क्या स्थिति रही होगी।
         
             हमें अभी रजत पॉकेट बुक्स के मालिक शलभ जी से मिलना था, लेकिन उनका कार्यालय दूर होने के कारण वहां जाना संभव न हो पाया, और संभव तो कंवल शर्मा जी से मिलना भी न हो पाया, वो भी शहर से बाहर घूमने गये थे।
         आबिद जी के घर पर दुर्गा पॉकेट बुक्स के मालिक पंकज जैन जी मिल गये। उन्होंने रीमा भारती से संबंधित रोचक किस्सा सुनाया। एक रीमा वह थी जो जिसके उपन्यासों पर फोटो प्रिंट होता था और एक बिना फोटो के।
          पंकज जैन जी से चर्चा के दौरान मनेष जी भी आ पहुंचे।       
          शाम को प्रसिद्ध उपन्यासकार परशुराम जी शर्मा से मिलना हुआ। उ‌नके म्युज़िक स्टुडियो में संगीत की धुनें गूंज रही थी।
संगीत अभ्यास करते हुए परशुराम शर्मा जी
 "तुझसे मिलने के लिए, दिल मेरा बेकरार है......।" आवाज में एक कसक थी, एक तड़फ थी, एक बेचैनी जो अपनी तरफ आकृष्ट करती थी। मैं और मनेष जी अंदर जाकर ऐसे बैठ गये जैसे किसी साधु के आश्रम में सत्संग के दौरान कोई सज्जन बैठे हों।
         अभ्यास के पश्चात परशुराम शर्मा जी ने आँखें खोली, हमारी तरफ देखा। लाल टी शर्ट और सफेद पायजामा,चेहरे पर घनी दाड़ी, चेहरे पर गंभीरता लेकिन आँखों में एक तरल हंसी लिए हुए वे हमसे मिले।
         "अरे! मानुष बाहर निकल आ।" आबिद रिजवी साहब ने पुकारा।
         "अच्छा, आप भी पधारे हैं।" हँसते हुए प्रति उत्तर मिला।
परशुराम शर्मा और आबिद रिजवी जी         
परशुराम शर्मा जी ने स्वयं को वक्त के अनुसार बदल लिया। एक वह समय था जब इनके उपन्यासों की चर्चा हर कहीं होती थी। लेकिन समय के साथ उपन्यास का बाजार ही सिमट गया।  लेकिन परशुराम शर्मा के अंदर का कलाकार उतना ही विस्तार पाता गया।  इन्होंने म्यूजिक स्टुडियो आरम्भ कर लिया, कुछ स्थानीय फिल्मों में अभिनय भी किया जो आज भी जारी है।
        परिचय के बाद हमने परशुराम शर्मा जी का एक साक्षात्कार भी लिया।
        इस दौरान मनेष जी का भी एक साक्षात्कार लिया।
परशुराम शर्मा जी के साथ
                 लंबी चर्चा के बाद हमने वहाँ से रवानगी ली। मनेष‌ जी और आबिद जी आगे निकल गये। मैं और गजाला जी पीछे रह गये। हालांकि इच्छा तो शगुन शर्मा जी से भी मिलने की थी पर शाम काफी हो गयी थी। इसलिए वह संभव न हो पाता।
               
05.06.2018
             यह मेरा मेरठ में तीसरा दिन था। दूसरी सुबह थी। अभी कुछ और लेखकों से मिलना था, पर अब संभव न था। आज घर वापसी थी।
               अभी एक काम और बाकी था। वह था आबिद जी के पुस्तक खजाने को देखना। बिना समय गवाये में उनकी पुस्तकों के खजा‌ने को संभालने लगा। विभिन्न भाषाओं, विभिन्न विषयों की असंख्य पुस्तकें वहाँ थी। मेरा लक्ष्य मात्र उपन्यास थे।
                 एक छोटे से कमरे के अंदर मुझे कुछ किताबें दिखाई दी। पता नहीं उनकी किसी ने कभी सुध ली थी या नहीं। मैं नीचे फर्श पर ही बैठ गया और एक -एक किताब को देखता रहा।
                  अगर आपके मन में लगन है तो कुछ न कुछ अच्छा मिल ही जाता। मुझे भी मिला। आबिद रिजवी जी के उपन्यास।  वे उपन्यास जिनकी जानकारी स्वयं आबिद जी को भी नहीं थी।
                  "सर, आपके उपन्यास मिले हैं।"
                  "मेरे उपन्यास, मुझे तो पता भी नहीं था की मेरे उपन्यास कभी उपलब्ध हो पायेंगे। यह तो दिये तले अंधेरे वाली बात हो गयी।"
                  "अब आप इनको सुरक्षित कीजिएगा।"
                  "इनको टाइप करवा के,अपनी साइट पर लगवाता हूँ। आज ही बल्लू को बोलता हूँ।"
                    बल्लू आबिद जी के टाइपिस्ट का नाम है।
                  यह खोज स्वयं में बहुत महत्व रखती है। अगर समय पर ध्यान न जाता तो शायद ये उपन्यास समय की मार में खत्म हो जाते।
                  मैंने स्वयं के लिए भी कुछ पुराने उपन्यास निकाले।  मेरे पास काफी सारी किताबें एकत्र हो गयी थी। दिल्ली दरियागंज से खरीदी गयी, कंबोज साहब के घर पर मित्रों से मिली किताबें, मनेष जैन जी से मिले उपन्यास और आबिद जी के खजाने से ली गयी किताबें।
                   इतनी किताबों को एक साथ उठाकर लाना तो संभव ही न था। यह जिम्मेदारी मनेष जी और गजाला जी ने ली की वो पार्सल से किताबे भेज देंगे। अब कुछ राहत थी।
                    दोपहर को आबिद जी से विदाई ली।
                    सफेद-पायजामा कुर्ता पह‌ने, चेहरे पर लाली, उस पर भारी मूँछें, पर होंठों पर एक मुस्कान सजाये। एक आकर्षक छवि के व्यक्तित्व हैं आबिद रिजवी जी। 'उपन्यास जगत के एनसाइक्लोपीडिया' आप उन्हें उपन्यास जगत की कोई भी बात पूछ लो, तुरंत उस विषय संबंधी कोई रोचक कहानी सुना देंगे।  इब्ने सफी से लेकर वर्तमान तक के उपन्यास लेखकों तक के संपर्क में हैं, आज भी वही ऊर्जा उनमें है।
                      मुझे आते वक्त सौ रुपये देकर विदा किया। बोले "यह तो शगुन है, आपको रखने ही होगे।"  उनके स्नेह को मना भी नहीं किया जा सकता था। दोबारा मिलने का वादा करके विदा ली।
                      गजाला जी ने मुझे बस स्टैण्ड तक छोड़ने आये। बस स्टैण्ड निर्माणाधीन था। मैंने बस स्टैण्ड के सामने दुकान से कुछ उपन्यास लिए हालांकि उसके बाकी नाममात्र के उपन्यास ही थे।
                         मेरठ, जहाँ जाना एक सपना था, वह पूरा हो गया। कभी इच्छा थी वेदप्रकाश शर्मा जी से मिलने की लेकिन वह ईश्वर को मंजूर न थी। मेरठ से मिला अपनापन, कुछ यादें, कुछ अफसाने और बहुत सी उपन्यास जगत की जानकारी।
                         मेरी स्मृति में रहेगी मेरठ की यह प्रथम उपन्यास यात्रा।
                    
आबिद रिजवी जी का साक्षात्कार
परशुराम शर्मा जी के म्यूजिक कक्ष में
रवि पॉकेट बुक्स कार्यालय में।        

3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरठ, वाह मेरी कर्म स्थली ,अच्छी मुलाकात रही आपकी।

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  2. उस दिन आपसे मुलाक़ात न हो पाने का गहरा अफ़सोस है.... पर चलिए शुक्र है कि आगे दिल्ली में मुलाक़ात हुई.
    संशिप्त सी, मिनिएचर सी ही सही लेकिन हुई.

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